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शिक्षा की खोज में

व्यासायिक प्रबन्धन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने तथा कार्य जीवन के 25 वर्ष पूर्ण करने के पश्चात पुनः शिक्षा के द्वार पर जाने की यात्रा — स्लोवेनिया के Ljubljana स्थित ICIPE में International MBA और पीटर एफ. ड्रकर के कथन को समझने का संस्मरण।

सत्यव्रत बड़गोहाईं, महाप्रबंधक (मानव संसाधन)1 October 20248 min read
शिक्षा की खोज में

व्यासायिक प्रबन्धन में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने तथा कार्य जीवन के 25 वर्ष पूर्ण करने के पश्चात मन में विचार आया कि एक बार पुनः शिक्षा के द्वार पर जाया जाये। वर्तमान समय में इस संकल्प या सिद्धांत का तार्किक महत्व है, क्योंकि जीवन की इस अवस्था में जब परिवार के प्रति भी दायित्व होते है, खासकर बच्चों की स्कूली शिक्षा तथा परिवार को पूरे एक वर्ष के लिए छोड़कर यूरोप में दौरा करना जीवन का एक महत्वपूर्ण संकल्प एवं सिद्धांत था।

इस शिक्षा यात्रा का प्रारम्भ भी काफी रोचक है। एक दिन मैं पावरग्रिड पुस्तकालय में हारवर्ड बिजनेस स्कूल का एक लेख (आर्टिकल) पढ़ रहा था, जिसमें मैनेजमेंट गुरु श्री पीटर एफ ड्रकर की निम्नलिखित पंक्तियों पर मेरा ध्यान गया:

"नॉलेज हैज टू बी इम्रूव्ड चैलेंज एण्ड इनक्रीज्ड कॉन्सटेन्टली ऑर इट वेनीशिज़" — पीटर एफ. ड्रकर
(Knowledge has to be improved, challenged and increased constantly or it vanishes)

उपरोक्त दो शब्दों का अभिप्राय समझने में मुझे कुछ समय लगा। उस समय मुझे यह समझ में आया कि ज्ञान में निरंतर सुधार, चुनौती एवं बढोत्तरी होनी चाहिए अन्यथा यह लुप्त हो जाती है।

इस घटना के दो-तीन माह के बाद, भारत सरकार का सार्वजनिक उपक्रम विभाग (डीपीई) का एक परिपत्र निगम द्वारा अग्रेषित किया गया, जिसमें स्लोवेनिया में आईसीपीई (इंटरनेशनल सेंटर फॉर प्रोमोशन ऑफ इंटरप्राइजेज) के अन्तर्राष्ट्रीय एमबीए प्रोग्राम के लिए इच्छुक अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गये थे। मैंने बिना देरी किये यह निर्णय लिया कि इस प्रकार का अवसर मेरे सेवाकाल में यदा-कदा ही आयेगा। अतः मुझे इस अवसर का उपयोग अवश्य करना है। इस संकल्प के साथ-साथ मैंने पारिवारिक दायित्वों का भी आंकलन किया तो पाया कि बच्चों की शिक्षा भी कोई जटिल स्थिति में नहीं है तथा एक वर्ष में तीन-चार महीने, जब बच्चों के स्कूल में अवकाश रहेगा, पूरा परिवार मेरे साथ यूरोप में रहेगा। इन बिन्दुओं पर परिवार ने भी मेरे विचारों से सहमति व्यक्त की। परिवार की सहमति मिलने के पश्चात, मैंने नामांकन हेतु आवेदन भरा, जिसे निगम द्वारा डीपीई को अग्रेषित कर दिया गया। तत्पश्चात, डीपीई ने मेरे नामांकन के प्रयोजन को स्वीकृति प्रदान करते हुए, मेरा नाम अन्तर्राष्ट्रीय एमबीए प्रोग्राम के लिए आईसीपीई संस्थान को भेजा गया।

आईसीपीई के बारे में

इंटरनेशनल सेंटर फॉर प्रोमोशन ऑफ इंटरप्राइजेज (आईसीपीई) संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित एक अंतः सरकारी संगठन है जिसका मुख्यालय स्लोवेनिया (पुराने यूगोस्लाविया का एक राज्य है) की राजधानी लुब्लियाना में है। इस संस्था का संगठन एवं संचालन सदस्य देशों यथा — लेटिन अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और यूरोप के देशों द्वारा किया जाता है। इस संस्था के 40 विकासशील देश सदस्य हैं। यह विश्व का एक मात्र सार्वजनिक उपक्रम आधारित संस्था है, जिसका मुख्य उद्देश्य यह है कि सभी विकासशील देशों के कुछ विषयों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए विश्व के उपक्रमों को तकनीक के हस्तांतरण (ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी ऑफ इंटरप्राइजिंग), सतत उद्यमिता, सामाजिक अभिवृद्धि आधारित ज्ञान के उन्नयन, परामर्श कार्य, अनुसंधान एवं प्रशिक्षण के द्वारा प्रोत्साहन एवं बढ़ावा देना है।

आईसीपीई की स्थापना से ही भारत सरकार इसका सक्रिय सदस्य है और भारत सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) के अनुसार भारत सरकार के केन्द्रीय सरकारी अधिकारी हर तीसरे महीने इस संस्थान में आकर विश्व में व्याप्त विभिन्न सार्वजनिक प्रशासनिक प्रणालियों को समझते हैं। इनकी संस्कृति एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के बारे में सूचनाएं एवं जानकारियां प्राप्त करते हैं तथा उनकी जो बेहतर प्रक्रियाएं है उनको भारत में लाने एवं प्रयोग करने पर विचार विमर्श, मंथन करते है।

स्लोवेनिया के बारे में

पुराने यूगोस्लाविया का एक राज्य स्लोवेनिया यूरोप का एक देश है, जोकि यूरोपियन यूनियन में शामिल होकर बहुत अल्प अवधि में यूरोपियन यूनियन के 27 देशों में से प्रथम 10 विकसित देशों की श्रेणी में आ गया है। स्लोवेनिया की जनसंख्या बहुत कम है और यह ऐसा देश है जिसमें प्रकृति के तीनों वरदान अर्थात् मैदानी इलाका, पर्वत एवं समुद्र उपलब्ध है। स्लोवेनिया मध्य यूरोप में स्थित है और आस्ट्रिया, इटली, क्रोएशिया, हंगरी, बेल्जियम इसके पड़ोसी देश हैं। इन देशों में स्लोवेनिया से आने जाने में बहुत कम समय लगता है। वैसे भी यूरोपियन यूनियन के देशों के मध्य कोई सीमा नहीं है। अतः लोग यूरोपियन यूनियन के किसी भी देश में आने-जाने एवं व्यापार करने हेतु स्वतंत्र हैं। स्लोवेनिया एक छोटा देश है और जिसकी जनसंख्या बहुत कम है। यहां पर बेरोजगार युवकों को 400 यूरो प्रति माह (रुपये 24,000) भत्ता मिलता है। यहां के निवासी प्रकृति प्रेमी हैं तथा यहां के कुल भूखण्ड का 60 प्रतिशत भाग जंगल से घिरा हुआ है।

अन्तर्राष्ट्रीय एमबीए कार्यक्रम के बारे में

विगम 20 वर्षों से इंटरनेशनल फॉर इंटरनेशनल सेंटर फॉर प्रोमोशन ऑफ इंटरप्रेजेज (आईसीपीई) एक अन्तर्राष्ट्रीय एमबीए प्रोग्राम संचालित कर रहे है। इस कार्यक्रम में सदस्य देश अपने देश के सिविल सेवाओं के अधिकारीगण और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कार्यपालकों का प्रयोजन कार्यक्रम हेतु करते है। इस कार्यक्रम में, इस वर्ष भारत सरकार की ओर से सात प्रतिभागी सैद्वांतिक विषयों का अध्ययन करने हेतु आये थे। इस कार्यक्रम में शामिल विषय एमबीए प्रोग्रामों के समकक्ष होते है। इस कार्यक्रम में हर 15 दिनों पर परीक्षा का प्रावधान है। प्रतिदिन सामूहिक चर्चा (ग्रुप डिस्कशन) एवं प्रस्तुतिकरण किया जाता है। इस कार्यक्रम के दौरान पढ़ाने हेतु संकाय सदस्य के रूप में यूरोप के नामी विश्वविद्यालयों के शिक्षक आते है।

आईसीपीई का अन्तर्राष्ट्रीय एमबीए ग्लोबल इक्विस (ग्लोबल इक्विस यूरोपियन क्वालिटी इम्प्रूवमेंट सिस्टम इन एजुकेशन) है और इस कार्यक्रम को यूरोपियन फाउण्डेशन ऑफ मैनेजमेंट डेवलपमेंट (ईएफएमडी) से स्वीकृति प्राप्त है। इस प्रोग्राम को अमेरिका की संस्था एएसीएसबी (द एसोसियेशन टू एडवांस कोलेजियेट स्कूल्स ऑफ बिजनेस, यूएसए) से अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है।

इस अंतर्राष्ट्रीय एमबीए प्रोग्राम की कुल अवधि 12 माह है अर्थात् 2 अकादमी वर्ष की है क्योंकि एक अकादमी वर्ष में 6 माह की उपस्थिति होने पर एक अकादमी वर्ष पूर्ण माना जाता है। इस कार्यक्रम की अभिकल्पना इस प्रकार से की गयी है कि 01 अक्टूबर से 30 सितम्बर तक पूरे एक वर्ष के दौरान दो अकादमी वर्ष की पढाई पूर्ण की जाती है।

इस कार्यक्रम की एक विशेषता यह है कि 40 प्रतिशत विषय ऐसे है जोकि विद्यार्थी को आनुभाविक अध्ययन (एक्सपिरिमेंटल लर्निंग) की सुविधा प्रदान करते है। जैसे कि संस्थान की ओर से गोल मेज परिचर्चा (राउण्ड टेबल डिस्कर्शन), सम्मेलन एवं सेमिनारों आदि का नियमित आयोजन किया जाता है तथा इन कार्यक्रमों के आयोजन में संस्थान प्रतिभागियों को शामिल करते हैं, जिसमें इन्हें कार्यक्रमों वास्तविक प्रबंधन एवं प्रतिभागिता करने का अवसर प्राप्त होता है। इस कार्यक्रम के दौरान जो बैठकें आयोजित की जाती हैं, उसमें यूरोपियन यूनियन के विभिन्न देशों के राजदूतों के साथ प्रतिभागियों को गोल मेज परिचर्चा करने का अवसर प्राप्त होता है। इस कार्यक्रम में सभी विद्यार्थी का भाग लेना तथा पहली पंक्ति में बैठना अनिवार्य है। बैठक उपरांत, भोज में भी माननीय राजदूत महोदय से विचार-विमर्श करने का अवसर प्राप्त होता है।

इसके अलावा, स्लोवेनिया स्थित भारतीय दूतावास के विभिन्न कार्यक्रमों जैसे — व्यापार विकास से सम्बन्धित बैठकों, सम्मेलनों, सेमिनारों, सामाजिक उत्तरदायित्व एजेण्डा पर आयोजित बैठकों में भी हम प्रतिभागियों को बुलाया जाता हैं। इस प्रकार के आयोजनों में शामिल होने से विद्यार्थियों को दूतावास के क्रियाकलापों की भी जानकारी प्राप्त होती है।

स्लोवेनिया में अनुभव

स्लोवेनिया में नवम्बर से मार्च महीने के बीच जबरदस्त बर्फबारी होती है। आलम यह रहता है कि रात भर में ही पूरा पेड़, घर, रास्ता एवं गाड़ी आदि बर्फ से ढक जाती है। कभी-कभी मैं परीक्षा के तनाव में रात 4-5 बजे उठ जाता था और खिड़की से बाहर देखने पर पाता था कि कर्मचारी लोग इतनी ठंड में भी इस समय रास्ते के बर्फ हटा रहे होते थे। इन्हें देखकर मैं अपने आपसे प्रश्न करता था कि क्या यह रात भर सोते नहीं है? लगता है इनका सुपरवाइजर बड़ा ही सख्त व्यक्ति होगा। लेकिन मैंने कई जगह देखा कि कामगार अपने दायित्व को समझते हुए कार्य का निर्वहन करते हैं और यह लोग समय पर कार्य पूर्ण कर गाड़ी में बैठ कर चले जाते है। इसी प्रकार हमारे छात्रावास के हाऊसकीपिंग कार्य में कार्यरत कर्मचारी भी अपना कार्य समय से पूर्ण कर चले जाते थे।

एक दिलचस्प तथ्य जो मैंने देखा वह यह था कि आप चाहे जितना भी पैसा खर्च करे आपको सप्ताहांत उपलब्ध नहीं रहता था। इससे मैंने यह समझा कि यहां पर लोग अपने कार्य और जीवन के बीच बहुत बढ़िया सामंजस्य अर्थात् वर्क लाइफ बैलेंस कायम किया हुआ है। मैंने यह भी देखा कि यहां के लोग शहर के अधिकतर घरों में शनिवार एवं रविवार तो ताला लगाकर समुद्र के किनारे चले जाते है तथा रविवार शाम या सोमवार की सुबह अपने काम वर पवापस आते है। यहां पर अधिकतर लोग अपना कारवैन लेकर चलते है जिसके अन्दर उनकी आवश्यकता की समस्त वस्तुएं उपलब्ध होती है और इस गाड़ी के ऊपर उनकी बोट एवं स्कीइंग सामान लदा होता है।

सबसे महत्वपूर्ण सीख

सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान जो इस प्रोग्राम से प्राप्त हुआ वह यह था कि आज से 25 वर्ष पूर्व अर्जित मास्टर डिग्री के लिए जो अध्ययन किया उसके उपरांत जो फील्ड वर्क किया और अब मैंने जो नवीन ज्ञान का अर्जन किया, उसमें पहले की अपेक्षा काफी अंतर पाया तथा मैंने यह महसूस किया कि 25 वर्ष पहले स्नाकोत्तर उपाधि की पढ़ाई में जो कुछ सीखा था वह काफी पुरातन हो चुका है।

मुझे याद है कि इस प्रोग्राम के दौरान मानव संसाधन प्रबंधन विषय पर आयोजित कक्षा में पढ़ाने हेतु अमेरिकन विश्वविद्यालय से पधारी संकाय सदस्य महोदया ने हम सभी प्रतिभागियों को अपना परिचय अपनी अर्जित उपाधि का उल्लेख करते हुए करने को कहा। जब हमारा परिचय सत्र समाप्त हुआ तो मैडम ने मुझसे कहा कि उन्हें हमसे सीखना है क्योंकि मैंने पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री (पर्सनल मैनेजमेंट) की उपाधि मैडम से पहले प्राप्त की थी तथा मुझसे 25 वर्षों का कार्य अनुभव भी प्राप्त है।

इस पर मैंने तुरंत विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि मैडम, मैंने जो 25 वर्ष पूर्व पढ़ा था वह लगभग भूल गया हूँ तथा अब मैं पुनः सीखने आया हूँ। मैंने यह भी स्पष्ट रूप से बताया कि यहां शिक्षा अर्जन के दौरान मेरा मुख्य उद्देश्य या भूमिका यह होगी कि अनभिज्ञता के कारण क्या-क्या नये सिद्धांत विकसित हुये या सिद्धांत में जुड़े होते है उनका ज्ञान प्राप्त करूं। साथ ही साथ मेरा यह भी प्रयास होगा कि बिजनेस की सफल गाथाओं के दौरान विकसित नवीन विचारों, सिद्धान्तों एवं सुधारों के बारे में अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करूं।

यहां पर अध्ययन के दौरान मैंने अनुभव किया कि यहां संकाय सदस्यों द्वारा जहां भी अनुभव पर आधारित मुद्दे आये वहां पर उन्होंने मेरे विचारों एवं योगदान को प्राथमिकता दी। मैंने भी सभी संकाय सदस्यों, विशेषकर मैडम द्वारा पढ़ाये/बताये गये सिद्धान्तों को नवीन प्रकार से सीखने की कोशिश की तथा विषय की व्याख्या करने का प्रयास किया। अंत में परीक्षा में मानव संसाधन प्रबंधन विषय में मुझे सर्वाधिक अंक प्राप्त हुए। मेरी इस सफलता के पीछे मेरी थिसिस की गाइड मैडम प्रेरणास्रोत रहीं। थिसिस तैयार करने में मैडम ने मदद प्रदान की। थिसिस डिफेंस प्रस्तुतिकरण में मेरा प्रस्तुतिकरण कमेटी के सदस्यों (जिसमें मैडम तथा आईसीपीआई के डाइरेक्टर जनरल भी सदस्य थे) ने जांच कर मुझे सर्वाधिक अंक प्रदान किये।

वापसी और उपसंहार

जब मैं स्लोवेनिया से प्रोग्राम खत्म होने के उपरांत वापस भारत आया तो उसके कुछ दिन पश्चात मुझे आईसीपीई की ओर से मेरा मूल प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ। तत्पश्चात, मैंने अपनी ओर से एक ई-मेल भेजकर मैंने डाइरेक्टर जनरल, आईसीपीई को धन्यवाद ज्ञापन प्रेषित किया तथा बताया कि विगत एक वर्ष की अवधि में मुझे आपके यहां काफी कुछ सीखने और शिक्षा अर्जित करने का लाभ मिला। इस ई-मेल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वास्तव में, उन्होंने हमसे बहुत कुछ सिखा।

यह वाक्य पढ़ने के उपरांत मुझे यह अनुभव हुआ कि कैरियर के इस मुकाम पर मुझे विश्वविद्यालय से प्राप्त 10 पृष्ठ के प्रमाण पत्र का इतना मूल्य नहीं है, जो दो वाक्य डीजी साहब ने लिखा है, उसका महत्व मेरे जीवन में अत्याधिक माने रखता है, जिसका कोई सम्बन्ध अंक या प्रमाण पत्र से नहीं है। वास्तव में इतने अनुभवी व्यक्ति भला हमसे क्या सीखेंगे। हमें महसूस हुआ कि हम लोग दूसरे के योगदान की प्रशंसा करने में भी संकोच महसूस करते हैं। कम से कम हमें उनकी पावती व्यक्त करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।

अब हमसे अगर कोई पूछता है कि इस शिक्षा अर्जन के दौरान क्या प्राप्त हुआ? तो मेरा जवाब होगा कि "हमें पीटर एफ ड्रकर का कथन समझ में आ गया है"।

Written by सत्यव्रत बड़गोहाईं, महाप्रबंधक (मानव संसाधन)
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